Tuesday, October 16, 2007

Email id's of Cricketers

1. LAXMAN : available@home-only.com

2. GANGULY : nowdays@no_use.com

3. KUMBLE : only@test_match.com

4. SACHIN : admitted@hospital.com

5. KAIF : good@for_nothing.com

6. SEHWAG : consistently@out_of_form.com

7. DRAVID : st ick@crease_like_fevicol.com

8. PATHAN : takewickets@only_with_keyna.com

9. GREG CHAPPELL : only_experiment@noresult.com

10. MUNAF PATEL : only_line&length@nospeed.com

11. HARBHAJAN : no_spinpitch@nowicket.com

12. SURESH RAINA : why_i_am_there@god_knows.com

Labels: , , , , , , , ,

Wednesday, June 13, 2007

क्या विदेशी कोच ही है अकेला ऑप्शन?

धर्मेन्द्र कुमार

ग्राहम फोर्ड के इनकार के तुरंत बाद दूसरे संभावित विकल्प जॉन एंबुरी ने भी यह कहकर अपनी मंशा जता दी है कि वह भी टीम इंडिया के 'दूसरे' कोच बनने में इंट्रेस्टेड नहीं हैं। बीसीसीआई के लिए इससे बड़ा तमाचा क्या हो सकता है! लेकिन क्या इस एपिसोड से सबक लेकर बीसीसीआई स्वदेशी कोच के बारे में सोचेगी या फिर अभी भी किसी गोरी चमड़ी वाले कोच की खोज में लगी रहेगी?

यह भलीभांति जानने के बावजूद कि भारत में क्रिकेट को सीधे-सीधे देश के गौरव से जोड़ कर देखा जाता है, बीसीसीआई लगातार विदेशी कोचों में टीम इंडिया का खेवनहार ढूंढ़ती रही है। अचंभा तो तब हुआ जब लंबे समय से स्वदेशी कोचों की वकालत करने वाले सुनील गावसकर भी विदेशी कोच का राग अलापते नजर आए।

असल में, भारत ही नहीं, किसी भी स्थापित टीम के लिए केवल उस देश का वाशिंदा ही बेस्ट कोच साबित हो सकता है। वजह है, प्रकृति व प्रवृत्ति। अगर प्रकृति की बात करें तो किसी भी देश के सभी नागरिकों पर वहां की संस्कृति, सभ्यता तथा राजनीतिक और आर्थिक परिवेश का सीधा-सीधा असर पड़ता है। इन्हीं सब कारकों से वहां के नागरिकों के व्यक्तित्वों का निर्माण होता है।

अगर हम अपने देश की बात करें तो यहां के नागरिक बहुत भावुक और 'लार्जर दैन लाइफ' इमेज में विश्वास करते हैं। मैदान चाहे खेल का हो, राजनीति का हो या फिर फिल्मों का। यहां पर किसी भी व्यक्ति या व्यक्तियों के व्यावसायिक या सामूहिक प्रदर्शन से पहले व्यक्तिगत प्रदर्शन को तरजीह दी जाती है। सामूहिक हित एक लक्ष्य हो सकता है लेकिन अंतिम नहीं। उदाहरण आप हर क्षेत्र में देख सकते हैं। फिल्मों की बात करें तो वह अमिताभ बच्चन हो सकते हैं, रजनीकांत हो सकते हैं जबकि फिल्म एक टीमवर्क का नतीज़ा होती है लेकिन पूजा नायक की होती है। राजनीति और खेलों के क्षेत्रों में भी नाम गिनाने की जरूरत नहीं है।

प्रवृत्ति की बात करें तो किसी भी देश के नागरिक आपसी मानवीय प्रवृत्तियों के ज्यादा अच्छे जानकार होते हैं, बजाय विदेशियों के। उन्हें कम से कम यह पता होता है कि इस परिवेश में किसी भी प्रतिभा का दोहन कहां और कैसे करना है, ताकि उसकी लार्जर दैन लाइफ इमेज को, जो उसकी इस परिवेश में मुख्य मानक है, नुकसान न पहुंचे। भारतीय क्रिकेट के मामले में किसी भी विदेशी कोच के लिए इस बात को समझ पाना खासा मुश्किल हो सकता है। ग्रेग चैपल का उदाहरण अभी पुराना नहीं हुआ है। चैपल के टीम हित में लिए गए निर्णयों को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता, लेकिन क्या वह सीनियर प्लेयरों का समुचित उपयोग कर पाए? क्या वह यह समझ पाए कि सीनियर खिलाड़ियों की भारतीय समाज में बनी छवि का सम्मान करते हुए कैसे टीम में उनका यूज किया जाए? इसके उलट, पूर्व में जब भी एस. वेंकटराघवन या किसी अन्य भारतीय कोच के हवाले टीम रही तो वह इस तरह बंटी नजर नहीं आई। मतभेद रहे होंगे, टीम का प्रदर्शन भी कुछ खास नहीं रहा होगा, लेकिन टीम सीनियर व जूनियर जैसे 2 हिस्सों में बंटी नजर नहीं आई। ऐसी टीम से आप कोई उम्मीद नहीं कर सकते जो इस तरह बंटी हुई हो।

अब ऐसा लगने लगा है, कि एक बार फिर से बीसीसीआई को स्वदेशी कोच के बारे में सोचना चाहिए। एक ऐसा कोच जो टीम के सीनियर और जूनियर खिलाड़ियों से उनकी प्रतिभा, पूर्व प्रदर्शन व गरिमा के अनुरूप काम ले सके।

Thursday, May 17, 2007

धर्मों के बीच लड़ाई का क्या काम

भटिंडा में सिखों व डेरा सच्चा सौदा के अनुयायियों के बीच का संघर्ष बेहद अजीब है। मानवता और विश्व बंधुत्व का संदेश देने वाले धर्मों और धर्मगुरुओं की जमीन कितनी पोली है, यह इस संघर्ष से साफ झलकता है।

यह बात बड़ी अजीब-सी लगती है कि धार्मिक गुरु अपने चेलों को पाप-पुण्य, स्वर्ग-नरक से डराकर अपनी सेवा तो करवा सकते हैं, पैसा तो बना सकते हैं, लेकिन मानव बनाने के लिए और इंसानियत दिखाने के लिए प्रेरित नहीं कर सकते।

चलिए मान लेते हैं कि सिखों को कंट्रोल करने के लिए कोई एक शख्स नहीं था, जिसकी बात मानकर सिख कंट्रोल में रहते, लेकिन डेरा सच्चा सौदा के गुरु तो इस स्थिति में हैं कि वे अपने अनुयायियों को सड़क पर न उतरने और अमन बनाए रखने के लिए प्रेरित कर सकें। लेकिन लगता है, जैसे उनकी भी रुचि टकराव में ही है। वैसे भी डेरा सच्चा सौदा के अनुयायी तमाम तरह के विवादों और अपनी हिंसक कार्रवाइयों के चलते पहले भी सुर्खियों में रहे हैं, लेकिन किसी धार्मिक पंथ का इस तरह से हिंसक कार्रवाइयों में हिस्सा लेना उसकी बुनियाद और शिक्षा पर प्रश्न चिह्न खड़ा करता है।

इसी तरह सिख धर्म के गुरुओं ने भी अपने अनुयायियों से कभी यह नहीं कहा कि मेरी नकल करने वालों को तुम मटियामेट कर दो। वे तो धार्मिक सहिष्णुता और मानवता का संदेश देने के लिए ही पूजे जाते हैं। तो फिर आखिर वह कौन-सा वीक पॉइंट है, जिसने दोनों धामिर्क घटकों को इस संघर्ष के लिए उत्प्रेरित किया।

गौर करें, तो इस संघर्ष के दो ही कारण नजर आते हैं और वे हैं-- गुरुओं व धर्मों की घटती ताकत और नेताओं की अपने स्वार्थों को लेकर धर्म को हथियार बनाने की बढ़ती प्रवृति। और सच पूछिए तो इन्हीं दो बातों को ठीक कर भविष्य में इस तरह के टकराव को रोका जा सकता है।

Labels: , ,

Thursday, March 29, 2007

ब्लॉगर्स के भरोसे नेट पर हिंदी

सरकारी बैसाखी पर भले ही भाषाएं फलती-फूलती हों, लेकिन साइबर स्पेस पर हिंदी ने आम लोगों की बदौलत अपने पैर पसारे हैं। और यहां आम लोग मौजूद हैं अपने-अपने ब्लॉग के साथ, जिन्हें यहां चिट्ठा नाम दिया गया है। जी हां, इंटरनेट पर मौजूद हिंदी कंटेट में सबसे बड़ा योगदान हिंदी में ब्लॉग लिखने वाले ब्लॉगरों का ही है, जिन्हें यहां चिट्ठाकार का नाम दिया गया है। ये चिट्ठाकार हर मुद्दे पर अपनी बेबाक राय रखते हैं, उसे दुनिया के साथ शेयर करते हैं, अपनी मन की भड़ास निकालते हैं, दूसरे ब्लॉगरों को दुलारते-पुचकारते हैं, उनकी खिंचाई करते हैं और जो सबसे बड़ी बात वे करते हैं, वह है हिंदी को समृद्ध करने की।

ये ब्लॉगर्स ही हैं, जिनकी बदौलत आज इंटरनेट पर हिंदी पहले की तरह दरिद्र नहीं है। हां, आपको अपेक्षित क्वॉलिटी वाली बात भले ही वहां नहीं मिले, लेकिन किसी भी चीज को सर्च करने पर खाली हाथ तो आप नहीं ही लौटेंगे। जाहिर है, यह 'कुछ नहीं' वाली स्थिति से तो बेहतर है ही। हिंदी ब्लॉगरों की दुनिया की एक बड़ी खासियत है, यहां के ब्लॉग्स के नाम। कुछ ब्लॉग्स के नाम तो इतने यूनीक हैं कि आप तुरंत उनके नाम का अर्थ जानने के लिए उत्सुक हो जाएं।

वैसे, हिंदी में ब्लॉगिंग का रास्ता इतना आसान भी नहीं रहा है। यह काम कितना कठिन रहा होगा, यह कोई उन लोगों से पूछे, जिन्होंने 'अभावों' के दिन में ब्लॉग लिखना शुरू किया था। तब स्थिति 'खुद लिखकर खुद ही पढ़ने' वाली थी, क्योंकि कोई सर्च इंजन हिंदी ब्लॉग को ढूंढकर पाठक तक पहुंचा नहीं पाता था। ऐसे में विश्व भर में फैले हिंदी प्रेमी भारतीयों, जिनमें आईटी सेक्टर से जुड़े लोगों की संख्या ज्यादा है, ने एक ऐसा प्लेटफॉर्म डिवेलप करने की पुरजोर कोशिश की, जहां हिंदी के तमाम पोस्टों को जमा किया जाए।

शुरुआती लड़खड़ाहट के बाद हिंदी की ब्लॉग यात्रा एक ऐसे ही प्लेटफॉर्म 'नारद' को डिवेलप करने के बाद संभलती चली गई। इसने उन तमाम कठिनाइयों को खत्म करने की कोशिश की, जो नेट पर हिंदी के आगे बढ़ने में बाधा खड़ी कर रही थी। मसलन, इसने नए ब्लॉगरों को तकनीकी सहायता उपलब्ध करवाने के साथ-साथ विश्व भर के हिंदी ब्लॉगरों को एक प्लेटफॉर्म पर लाने के कोशिश की, ताकि लोगों को हिंदी के ब्लॉग पढ़ने के लिए साइबर स्पेस में यूं ही भटकना नहीं पड़े। जाहिर है, हिंदी ब्लॉग को आज की स्थिति में पहुंचाने का श्रेय अगर किसी को जाता है, तो वह 'नारद' ही है। वास्तव में, यह एक ब्लॉग एग्रीगेटर साइट है, जो तमाम हिंदी ब्लॉगों की फीड का उपयोग कर उनकी पोस्ट एक जगह दिखाती है। जाहिर है, अगर कोई अनजान व्यक्ति हिंदी के ब्लॉग्स पढ़ना चाहता है, तो उसके लिए 'नारद' पर जाने से बढ़िया विकल्प कुछ भी नहीं।

दिलचस्प बात यह है कि इसका कोई व्यावसायिक स्वार्थ नहीं है और यह मूल रूप से चंद ऐसे हिंदी प्रेमी भारतीयों की मेहनत का नतीजा है, जो भारत ही नहीं, भारत से बाहर रहकर भी अपनी मिट्टी से जुड़े हुए हैं। वास्तव में इन लोगों ने तन, मन, धन से हिंदी के विकास के लिए काम किया है और वह भी नि:स्वार्थ भाव से। यह हिंदी को लेकर लोगों की दीवानगी ही है कि विश्व के अलग-अलग जगहों पर रहने के बावजूद 'नारद' के शुरुआती कर्ताधर्ता रहे यूएसए बेस्ड पंकज नरूला व कुवैत बेस्ड जितेंद्र चौधरी ने इतना बड़ा प्लेटफॉर्म विकसित किया। फिर इसे मजबूत करने में देबाशीष सहित कम से कम आठ लोग और हैं, जो अपनी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं और हिंदी ब्लॉगरों की किसी भी समस्या के समाधान के लिए तैयार रहते हैं।

वैसे, हिंदी ब्लॉगरों के सामने सबसे बड़ी समस्या तकनीक की ही है, क्योंकि अभी हिंदी में काम करने में सहायक सॉफ्टवेयर्स की पहुंच हर जगह नहीं हुई है और फिर यहां सारा काम यूनीकोड के भरोसे है। लेकिन अच्छी बात यह है कि अगर आप ब्लॉर्ग्स की इस दुनिया में जाकर अपनी समस्या बताएं, तो एक साथ कई हाथ आपकी मदद में आगे आ जाएंगे। जाहिर है, यह सब यहां संभव हुआ है उन लोगों के भरोसे, जिन्हें दूसरे की मदद में मजा आता है।

इसमें कोई शक नहीं कि साइबर स्पेस में हिंदी की पैठ लगातार बढ़ती जा रही है और इसका सबसे बड़ा प्रमाण है ब्लॉग्स और इनके पाठकों की बढ़ती संख्या। सिर्फ नारद पर एक हफ्ते में औसतन छह हजार लोग आते हैं और यहां लगभग छह सौ ब्लॉग्स सक्रिय हैं, जिसमें हर तरह के ब्लॉग्स शामिल हैं। इसे देखकर आप कह सकते हैं कि आज हिंदी ब्लॉग जगत हर तरह से परिपूर्ण है। यहां ह्यूमर है, साहित्य है, रोजमर्रा की घटनाओं पर बहस है, सामाजिक-राजनीतिक चर्चा है, देश के हर क्षेत्र की खबर है और जो सबसे बड़ी बात है, वह है कि यहां हिंदी का एक बड़ा संसार है, जिसमें दुनिया भर में फैले हिंदी जानने वाले लोग हैं।

दिलचस्प बात यह है कि हिंदी ब्लॉग जगत में हर साल अवॉर्ड भी दिए जाते हैं। ऐसे ही एक 'इंडीब्लॉगिज अवॉर्ड' में इस साल सर्वश्रेष्ठ हिंदी ब्लॉगर का खिताब जीता है कनाडा बेस्ड समीर लाल ने। यानी हिंदी सही मायने में ग्लोबल लैंग्वेज है, कम से कम हिंदी ब्लॉग जगत को देखकर तो आप यह कह ही सकते हैं!

साभारः नवभारत टाइम्स

Labels: , , , ,