Wednesday, December 21, 2005

प्रेमियों पर बरसा पुलिस का कहर

अभी कल की ही बात है। मेरठ के गांधी पार्क में पुलिस द्वारा प्रेमी- प्रेमिकाओं को जमकर धुना गया। ऐसी ही एक घटना पहले भी घटी थी और तब रेस्टोरेंट में बैठे प्रेमी जोड़े पुलिस का निशाना बने थे. महिलाओं के साथ छेड़खानी करने वाले मनचलों के खिलाफ अभियान चलाने के नाम पर पुलिस ने इस ऑपरेशन 'मजनूं' को चलाया. परंतु टीवी पर इस ऑपरेशन का नजारा देखकर तो कहीं से ऐसा नहीं लगा कि पुलिस का शिकार 'मनचले' थे.

पुलिस के इस कार्रवाई की पूरे देश में निंदा हो रही है। प्रश्न यह है कि सही कौन है- कानून-व्यवस्था दुरुस्त रखने के नाम पर कार्रवाई करने वाली पुलिस या फिर व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर घटना की आलोचना करने वाले लोग।

दिल्ली के संदर्भ में इस घटना को देखें, तो दिल्ली के युवा इस मामले में थोड़े नसीब वाले हैं. दिल्ली में तो मेरठ के गांधी पार्क जैसे पार्कों की बहुतायत है। लोदी रोड, बुद्धा जयंती पार्क, पुराना किला, जापानी पार्क, बोंटा पहाड़ी..... नाम गिनने लगे, तो हर दस किलोमीटर पर यहां कम से कम दो ऐसे पार्क निकलेंगे, जो प्रेम-प्रेमिकाओं की सभी गलत-सही हरकतों का रोज गवाह बनते हैं। परंतु अभी तक यहां के युवाओं को ऐसी घटना का शिकार नहीं होना पड़ा है. लेकिन ऐसा नहीं है कि वे पुलिस की मनमानी और जोर जबरदस्ती का शिकार नहीं होते. वर्दी का रौब दिखाकर पार्कों में बैठे प्रेमी जोड़ों से 20-50 रूपए वसूलना आम है.

यही नहीं हमारे प्रजातंत्र के इन सिपाहियों को बसों में दो-चार रूपए का टिकट लेने के बजाए 'स्टाफ' की धौंस देकर बेचारे बस कंडक्टरों को धमकाते हुए आप कहीं भी देख सकते हैं. सवाल यह है कि क्या कानून व्यवस्था को दुरस्त करने और मनचलों से निपटने का यही एकमात्र उपाय बचा था? क्या सिर्फ एक खाकी वर्दी के नाम पर पुलिस को किसी भी हद तक जाने का अधिकार मिल जाता है? पता नहीं कानून व्यवस्था बिगाड़ने के लिए कौन ज्यादा जिम्मेदार है अपराधी या हमारे वर्दीधारी.

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